चंडीगढ़, पंजाब। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और पंजाब सरकार से स्कूलों में 25% आरटीई (राइट टू एजूकेशन) कोटा लागू न करने से संबंधित याचिका पर जवाब मांगा है। याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि लगभग दो लाख बच्चे निजी स्कूलों के प्रवेश स्तर पर दाखिला लेते हैं, जिनमें से कम से कम 50,000 बच्चों को आरटीई अधिनियम के तहत प्रवेश देना आवश्यक है।
सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया है कि वह एक जिले में सर्वेक्षण कर यह पता लगाए कि कितने स्कूल कानून का पालन नहीं कर रहे हैं। अदालत ने इस संबंध में केंद्र और राज्य सरकारों से भी विस्तृत जानकारी मांगी है कि उन्होंने इस अधिनियम के क्रियान्वयन में किन-किन कदमों को अंजाम दिया है।
आरटीई अधिनियम के तहत निजी स्कूलों को अपने प्रवेश स्तर पर 25% सीटें आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों के लिए आरक्षित करनी होती हैं। यह प्रावधान शिक्षा के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। हालांकि, याचिकाकर्ता का दावा है कि कई निजी स्कूल इस कोटा का पालन करने में विफल हैं, जिससे आरटीई से जुड़े अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है।
विधिक विशेषज्ञों के अनुसार, यदि अदालत आदेश जारी करती है तो यह निजी स्कूलों को आरटीई के प्रावधानों के अनुपालन के लिए बाध्य करेगा और शिक्षा के अधिकार को मजबूती प्रदान करेगा। पंजाब सरकार की ओर से अभी तक इस मामले में कोई ठोस जवाब नहीं आया है, जबकि केंद्र सरकार भी इससे जुड़ी रिपोर्ट सौंपने में पिछड़ रही है।
यह मामला शिक्षा के प्रति न्यायिक हस्तक्षेप और सरकारों के क्रियान्वयन की पारदर्शिता को लेकर बड़ा उदाहरण माना जा रहा है। इस बीच, अभिभावक और शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाली संस्थाएं इस निर्णय का बेसब्री से इंतजार कर रही हैं ताकि बच्चों के अधिकार सुरक्षित हो सकें और सभी को समान अवसर मिल सके।
अधिकार कार्यकर्ताओं ने भी इस मामले को लेकर आशंका जताई है कि यदि आरटीई का सही तरीके से पालन नहीं किया गया तो शिक्षा में असमानता बढ़ सकती है, जो सामाजिक न्याय के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध होगा। अदालत का यह कदम शिक्षा के अधिकार को सशक्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।
Author: UP 24.in
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