उन मरीजों के लिए क्यों वर्षों लग जाते हैं उत्तर खोजने में, जिनमें एक साथ कई पुरानी बीमारियां होती हैं

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Why patients with overlapping chronic condition often spend years seeking answers

नई दिल्ली, भारत – विशेषज्ञों का कहना है कि साझा पुरानी बीमारियों जैसे PASH सिंड्रोम, हाइड्राडेनाइटिस सुप्पुराटिवा, फाइब्रोमायलगिया और इर्रिटेबल बॉवेल सिंड्रोम से पीड़ित मरीजों के लिए देरी से निदान, टूटे हुए इलाज और उच्च उपचार लागत बड़ी चुनौतियां बनी हुई हैं।

इन मरीजों को अक्सर अपने लक्षणों का वास्तविक कारण जानने में महीनों या साल लग जाते हैं, क्योंकि उनकी समग्र स्थिति को समझना और सही ढंग से निदान करना चिकित्सा क्षेत्र में एक जटिल प्रक्रिया है। विशेषज्ञ बताते हैं कि चिकित्सकों के बीच रोगों का फрагमेंटेड दृष्टिकोण और चिकित्सा सेवाओं की भिन्नता के कारण, मरीजों को बार-बार विभिन्न विशेषज्ञों के पास जाना पड़ता है, जिससे उनकी परेशानी और बढ़ जाती है।

“इन अवस्थाओं के लक्षण अक्सर असाधारण और अस्पष्ट होते हैं, जिससे एक विशिष्ट निदान स्थापित करना कठिन हो जाता है,” एम्स की वरिष्ठ त्वचा विशेषज्ञ डॉ. सीमा शर्मा ने बताया। “अधिकतर मामलों में, मरीजों को कई विभिन्न परीक्षण और उपचार करवाने पड़ते हैं, जिनका सकारात्मक परिणाम भी तुरंत नहीं मिलता।”

इसके अलावा, इन बीमारियों के उपचार की लागत भी मरीजों पर भारी पड़ती है। आमतौर पर लंबी अवधि तक चलने वाले इलाज और दवाइयों के खर्च के कारण आर्थिक दबाव बढ़ जाता है, जिससे कई रोगी उपचार रोक देते हैं या अपनी समस्याओं को नजरअंदाज करते हैं।

हाइड्राडेनाइटिस सुप्पुराटिवा जैसे रोगों में त्वचा पर लगातार संक्रमण और दर्द के कारण मरीज जीवन की गुणवत्ता में भारी गिरावट महसूस करते हैं। फाइब्रोमायलगिया के मामलों में भी व्यापक मांसपेशीय दर्द, थकान और नींद की समस्या से जूझना पड़ता है, जो कामकाजी जीवन और सामाजिक जीवन दोनों को प्रभावित करता है।

डॉ. राजीव वर्मा, जीआई विशेषज्ञ, बताते हैं कि इर्रिटेबल बॉवेल सिंड्रोम से पीड़ित मरीजों का भी उचित समय पर निदान न होना अक्सर उनकी स्थिति बिगाड़ देता है। “मरीजों को सही डाइट, जीवनशैली और दवाइयों के माध्यम से इलाज दिया जाना चाहिए, लेकिन देरी और गलत निदान उनकी बीमारी को जटिल बना देते हैं।”

विशेषज्ञों के अनुसार, इन बीमारियों से पीड़ित मरीजों के लिए एक समन्वित और बहुविषयक दृष्टिकोण आवश्यक है। चिकित्सकों, मनोवैज्ञानिकों और पोषण विशेषज्ञों की टीम मिलकर मरीजों की जांच और उपचार की योजना बनाएं, ताकि आजीवन इलाज की गुणवत्ता को बेहतर बनाया जा सके।

इसके साथ ही, जन जागरूकता बढ़ाने एवं उपचार से जुड़ी लागत को कम करने के लिए नीतिगत सुधार भी जरूरी हैं, जिससे मरीजों को बेहतर सुविधाएं मुहैया हो सकें।

अंततः, मेडिकल प्रैक्टिस में सुधार और समय पर सही निदान से बहुत सारे मरीजों का जीवन बदल सकता है। इस दिशा में निरंतर प्रयास ही मरीजों के लिए राहत और स्थायी समाधान प्रदान कर सकते हैं।

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UP 24.in
Author: UP 24.in

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