इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश – भारतीय न्याय व्यवस्था की धीमी प्रक्रिया को लेकर सर्वोच्च न्यायालय की चिंता लगातार बढ़ती जा रही है। हाल ही में एक केस में इलाहाबाद उच्च न्यायालय को हत्या के दोषसिद्धि अपील पर निर्णय देने में करीब 40 वर्षों का वक्त लग गया, जिससे न्याय मिलने में विलंब की गंभीर समस्या सामने आई है।
इस मामले की गंभीरता को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालयों के न्याय वितरण तंत्र में जमे फंसे मामलों को जल्द निपटाने के उपाय खोजने की आवश्यकता जताई है। कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि लंबित मामलों के कारण न सिर्फ न्याय पक्षपाती हो रहा है, बल्कि पीड़ितों को भी उचित न्याय नहीं मिल पा रहा।
एक वरिष्ठ न्यायाधीश ने कहा, “यदि हम न्यायिक प्रक्रिया में सुधार नहीं करेंगे तो न्याय तंत्र की विश्वसनीयता धूमिल हो जाएगी। कोर्ट घंटों, दिनों या महीनों की बात नहीं कर रहा, यहां तो चार दशकों से अधिक समय लग गया है एक अपील का फैसला देने में।”
वहीं, न्यायालय के पदाधिकारी और वकील लगातार मामलों के तेजी से निपटारे के लिए तकनीकी सुधारों और संसाधन वृद्धि की मांग कर रहे हैं। जजों की संख्या बढ़ाना, डिजिटलाइजेशन को बढ़ावा देना, और अधिक चौकस फैसलों की जरूरत पर जोर दिया जा रहा है ताकि फंसे मामले जल्द से जल्द निपट सकें।
विशेषज्ञों का मानना है कि न्यायिक सुधार एक जटिल प्रक्रिया है जिसमें संसाधनों के साथ-साथ नीति स्तर पर गंभीर बदलाव की आवश्यकता है। केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर न्यायिक प्रक्रियाओं को बेहतर बनाने के लिए कारगर कदम उठाने होंगे।
यह मामला न केवल न्यायपालिका की प्रणालीगत चुनौतियों को उजागर करता है, बल्कि समाज के प्रति एक बड़ा संदेश भी भेजता है कि न्याय मिलने में विलंब समाज में असंतोष और अविश्वास पैदा करता है।
इस संदर्भ में, यह आवश्यक है कि न्यायालय और सरकार एक संयुक्त पहल करें जिससे कि न्याय वितरण प्रणाली अधिक पारदर्शी, त्वरित और प्रभावी बन सके। तभी देश के नागरिकों का विश्वास और न्याय की प्रतिष्ठा दोनों बचे रहेंगे।




