नई दिल्ली, दिल्ली
जून 24 को, जो पासपोर्ट अधिनियम के लागू होने की 59वीं सालगिरह भी है, विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट कर दिया कि भारतीय पासपोर्ट केवल एक यात्रा दस्तावेज़ है, नागरिकता का प्रमाण नहीं। यह घोषणा सार्वजनिक रूप से की गई, जिसे सुनकर आम जनता में अफ़रातफ़री फैल गई, हालांकि यह कोई नई बात नहीं है। कानूनी दृष्टि से यह स्थिति दशकों से तय है परंतु अब पहली बार इसे खुले तौर पर कहा गया है।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने बताया कि 2025 में 1.39 करोड़ पासपोर्ट जारी किए गए, और पासपोर्ट से जुड़ी सेवाएं 1.5 करोड़ लोगों तक पहुंची। इतने बड़े पैमाने पर सिर्फ दो सेकंड में एक पासपोर्ट जारी करना, यह दर्शाता है कि हर एक दस्तावेज़ को नागरिकता का निर्णायक प्रमाण मानना व्यावहारिक रूप से असंभव है।
पासपोर्ट अधिनियम, 1967 की धारा 20 के तहत भारत सरकार किसी गैर-नागरिक को भी पासपोर्ट जारी कर सकती है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि पासपोर्ट का होना जरूरी नहीं कि वह व्यक्ति भारतीय नागरिक ही हो।
विशेष गृह समीक्षा और मतदाता सूची के नए संशोधनों के मद्देनजर देश अब पहचान और नागरिकता के बीच के फासले को समझने लगा है। ये दोनों अलग-अलग अवधारणाएं हैं। पहचान के लिए कई दस्तावेज होते हैं, पर कोई भी दस्तावेज़ नागरिकता का पूर्ण प्रमाण नहीं देता।
सरकार का यह स्पष्ट बयान इस बात पर भी प्रकाश डालता है कि नागरिकता का प्रमाण पत्र अलग होने चाहिए और पासपोर्ट केवल यात्रा के लिए अनुमति पत्र के समान है। यह स्थिति चुनाव आयोग और अन्य सरकारी संगठनों के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि मतदाता सूची में नामांकन के लिए नागरिकता का प्रमाण आवश्यक होता है, पासपोर्ट नहीं।
इस विषय पर कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्पष्टीकरण न्यायिक संकल्पों के अनुरूप है और भारत में नागरिकता कानूनों का सम्मान करता है। यह आम जनता के लिए भी ज़रूरी है कि वे इस अंतर को समझें, जिससे भविष्य में पहचान और नागरिकता के मामले में भ्रम कम हो सके।
अंततः, यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि भारतीय पासपोर्ट एक राष्ट्रीय पहचान और यात्रा का दस्तावेज़ है, जबकि नागरिकता का प्रमाण एक अलग कानूनी प्रमाणपत्र है। सरकार का यह संवाद नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है।
Author: UP 24.in
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