नई दिल्ली, भारत — विश्व के सबसे ठंडे क्षेत्र आर्कटिक में एक गंभीर पर्यावरणीय खतरे का आकलन हुआ है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि आर्कटिक के जमाए गए कार्बन भंडार अगले कुछ दशकों के भीतर कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) सोखना बंद कर सकते हैं और इसके बजाय उत्सर्जन करना शुरू कर सकते हैं। यह परिवर्तन पृथ्वी के जलवायु तंत्र के लिए गंभीर चुनौती पेश कर सकता है।
आर्कटिक क्षेत्र वर्षों से पृथ्वी के कार्बन चक्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। यहां जमा हुए मिट्टी और पर्माफ्रॉस्ट में भारी मात्रा में जैविक कार्बन सुरक्षित है, जो प्राकृतिक रूप से वातावरण में CO2 के स्तर को नियंत्रित करता है। हालांकि वैश्विक तापमान में वृद्धि के कारण पर्माफ्रॉस्ट का पिघलना शुरू हो गया है, जिससे यह भंडार खतरे में पड़ गया है।
वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी के नतीजेस्वरूप पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने की प्रक्रिया तेज हो गई है। परिणामस्वरूप वहां जमा कार्बन हवा में मुक्त होने लगा है, जो ग्रीनहाउस गैसों के बढ़ते स्तर को और बढ़ाता है। वैज्ञानिक अनुसंधान बताते हैं कि यदि यह प्रवृत्ति इसी तरह बनी रही तो 2050 के दशक तक आर्कटिक की यह कार्बन गरदन उत्सर्जन स्रोत बन सकती है।
अंतरराष्ट्रीय शोध संगठन और पर्यावरण विशेषज्ञ इस पर गहरी चिंता जता रहे हैं। उनका कहना है कि यह प्रकृति की ओर से एक चेतावनी है कि जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए तुरंत प्रभावी कदम उठाए जाने चाहिए। अन्यथा, यह पर्यावरणीय आपदा वैश्विक तापमान में वृद्धि को और अधिक तेजी से बढ़ावा दे सकती है जिससे प्राकृतिक आपदाओं की संख्या और तीव्रता दोनों में वृद्धि होगी।
इस गंभीर स्थिति के मद्देनजर विभिन्न देशों ने आर्कटिक क्षेत्र के संरक्षण और जलवायु परिवर्तन नियंत्रण के लिए संयुक्त प्रयासों की आवश्यकता पर ज़ोर दिया है। इसमें पर्माफ्रॉस्ट के संरक्षण के लिए नीतिगत बदलाव, स्वच्छ ऊर्जा के विकास को प्रोत्साहन और उत्सर्जन नियंत्रण के कड़े नियम शामिल हैं।
विज्ञानी लगातार इस क्षेत्र की निगरानी कर रहे हैं और शोध के माध्यम से अधिक सटीक जानकारी जुटा रहे हैं ताकि भविष्य में कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित किया जा सके और पृथ्वी के जीवन के लिए इस खतरे को टाला जा सके।



