नई दिल्ली: हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी सामरिक और आर्थिक ताकत बढ़ाने की दिशा में भारत ने एक बड़ा कदम उठाया है। केंद्र सरकार ने करीब 9 अरब डॉलर की लागत वाले ग्रेट निकोबार मेगा प्रोजेक्ट को मंजूरी दे दी है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना को केवल बुनियादी ढांचा विकास नहीं, बल्कि भारत की दीर्घकालिक समुद्री और सुरक्षा रणनीति का अहम हिस्सा माना जा रहा है।
ग्रेट निकोबार द्वीप की भौगोलिक स्थिति इसे बेहद महत्वपूर्ण बनाती है। अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का यह सबसे दक्षिणी हिस्सा दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक मलक्का जलडमरूमध्य (Strait of Malacca) के बेहद करीब स्थित है। यही वजह है कि रक्षा विशेषज्ञ इसे भारत के लिए भविष्य का रणनीतिक गेमचेंजर मान रहे हैं।
परियोजना के तहत गालाथिया खाड़ी में एक विशाल अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, नागरिक और सैन्य उपयोग वाला हवाई अड्डा, बिजली संयंत्र, पर्यटन अवसंरचना और लगभग 3.5 लाख लोगों की क्षमता वाली आधुनिक टाउनशिप विकसित की जाएगी। परियोजना का पहला चरण वर्ष 2028 तक पूरा होने का लक्ष्य रखा गया है।
क्यों महत्वपूर्ण है मलक्का स्ट्रेट?
मलक्का जलडमरूमध्य हिंद महासागर और प्रशांत महासागर को जोड़ने वाला दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग माना जाता है। वैश्विक व्यापार का बड़ा हिस्सा और एशियाई देशों की ऊर्जा आपूर्ति इसी रास्ते से होकर गुजरती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, चीन के कुल समुद्री व्यापार का बड़ा भाग और उसके तेल आयात का लगभग 70 से 80 प्रतिशत हिस्सा इसी मार्ग पर निर्भर है। इसी कारण चीन लंबे समय से “मलक्का दुविधा” (Malacca Dilemma) का सामना कर रहा है। यदि किसी संकट या संघर्ष की स्थिति में यह मार्ग प्रभावित होता है तो चीन की आपूर्ति श्रृंखला और ऊर्जा सुरक्षा पर गंभीर असर पड़ सकता है।
भारत को कैसे मिलेगा फायदा?
ग्रेट निकोबार में विकसित होने वाला ट्रांसशिपमेंट पोर्ट भारत को कोलंबो, सिंगापुर और अन्य विदेशी बंदरगाहों पर निर्भरता कम करने में मदद करेगा। वर्तमान में भारतीय कंटेनरों का बड़ा हिस्सा विदेशी ट्रांसशिपमेंट हब के माध्यम से संचालित होता है, जिससे राजस्व का बड़ा भाग दूसरे देशों को जाता है।
नया गहरे पानी का बंदरगाह तैयार होने के बाद भारत सीधे बड़े कंटेनर जहाजों को संभाल सकेगा। इससे लॉजिस्टिक्स लागत कम होगी, व्यापारिक दक्षता बढ़ेगी और समुद्री क्षेत्र में भारत की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता मजबूत होगी।
चीन के लिए क्यों बढ़ेगी चुनौती?
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रेट निकोबार में मजबूत बुनियादी ढांचा विकसित होने से भारत को मलक्का क्षेत्र में समुद्री गतिविधियों की बेहतर निगरानी करने की क्षमता मिलेगी। इससे हिंद महासागर और पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र के बीच आने-जाने वाले जहाजों की गतिविधियों पर नजर रखना आसान होगा।
हालांकि विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि भारत का उद्देश्य किसी समुद्री मार्ग को अवरुद्ध करना नहीं है। लेकिन किसी संभावित संकट की स्थिति में क्षेत्रीय संतुलन और सामरिक प्रभाव के लिहाज से भारत की स्थिति पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत हो सकती है।
पर्यावरणीय चिंताएं भी बरकरार
जहां एक ओर इस परियोजना को राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक विकास के लिहाज से महत्वपूर्ण बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर पर्यावरणविदों और स्थानीय समुदायों ने इसके संभावित प्रभावों को लेकर चिंता जताई है। ग्रेट निकोबार जैव विविधता से समृद्ध क्षेत्र है और यहां शोम्पेन जैसी आदिवासी जनजातियां भी निवास करती हैं।
हालांकि सरकार का कहना है कि सभी पर्यावरणीय मानकों और आवश्यक मंजूरियों का पालन करते हुए परियोजना को आगे बढ़ाया जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना इस परियोजना की सबसे बड़ी चुनौती होगी।
ग्रेट निकोबार परियोजना को भारत की समुद्री रणनीति के नए अध्याय के रूप में देखा जा रहा है। यदि यह योजना निर्धारित समय पर पूरी होती है तो आने वाले वर्षों में भारत हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी आर्थिक और सामरिक उपस्थिति को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सकता है।
Author: UP 24.in
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