नई दिल्ली, भारत – भारत के सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में “घरेलू देखभाल की हानि” को मुआवजे योग्य मान्यता दी है, जिसके तहत गृहिणी के काम की आर्थिक मूल्यांकन राशि ₹30,000 प्रतिमाह निर्धारित की गई है। यह फैसला गृहिणियों के अक्षम और बिना वेतन के काम को कानूनी मान्यता देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
घर के भीतर किया जाने वाला काम, जैसे कि सफाई, खाना बनाना, बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल, आर्थिक दृष्टि से अनदेखी होता आया है। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय से यह स्पष्ट होता है कि घरेलू श्रम न केवल सामाजिक बल्कि आर्थिक रूप से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि घरेलू देखभाल कार्य भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का एक बड़ा हिस्सा है, जो मुख्यतः महिलाओं द्वारा किया जाता है।
इस निर्णय का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इससे घरेलू काम में लिंग आधारित असमानता की समस्या पर भी प्रकाश पड़ता है। महिलाओं को घर के कामों में disproportionate रूप से अधिक समय और श्रम देना पड़ता है, जबकि यह श्रम अप्रत्यक्ष रूप से उनकी आर्थिक स्वतंत्रता और रोजगार के अवसरों को प्रभावित करता है।
विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि इस मुआवजे को स्थापित करने से समाज में घरेलू काम की महत्ता को समझने की बेहतर सहूलियत बनेगी। यह निर्णय महिलाओं के कानूनी अधिकारों को सशक्त बनाता है और घरेलू श्रम की आर्थिक कीमत को मान्यता देता है, जो पहले अनदेखी की जाती थी।
सरकार और नीति निर्धारकों के लिए यह एक संदेश है कि घरेलू श्रम को केवल एक सामाजिक या पारिवारिक जिम्मेदारी के रूप में ही न देखें, बल्कि इसे आर्थिक योगदान के रूप में स्वीकार करें। इससे भविष्य में महिलाओं के लिए न्यायसंगत मुआवजा और सुविधाएं सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी।
इस महत्वपूर्ण फैसले से प्रभावित होकर, सामाजिक संगठन और महिला अधिकार समूह भी अब इस दिशा में और ज्यादा आवाज उठा रहे हैं, ताकि महिलाओं के घरेलू काम को आर्थिक मूल्य दिया जा सके और उन्हें उचित सम्मान मिले।
सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय ने भारत में घरेलू श्रम की स्थिति और उसका महत्व नई दिशा में ले जाने का काम किया है, जिससे ना केवल घरेलू कामगारों बल्कि पूरे समाज को न्याय मिलने की उम्मीद बढ़ी है।




