रोमिला थापर की संस्मरण ‘जस्ट बीइंग’: एक स्वतंत्र महिला की निडर यात्रा

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Romila Thapar’s memoir, ‘Just Being’: A fearless journey of an autonomous woman

नई दिल्ली, दिल्ली — विश्वप्रसिद्ध इतिहासकार रोमिला थापर द्वारा कलिदास के अभिज्ञानशाकुन्तलम पर दी गयी एक विशेष व्याख्यान ने शैक्षिक जगत में गहरी छाप छोड़ी है। दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस में आयोजित इस व्याख्यान में थापर ने महाभारत और कलिदास के शाकुन्तला के चित्रण के बीच गहरे सांस्कृतिक और सामाजिक भेदों पर प्रकाश डाला।

इस आयोजन में भारत की पुरातन कथाओं और उनके सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों की विवेचना का एक अनूठा परिचय मिला। रोमिला थापर, जो अपने निडर दृष्टिकोण और स्वतंत्र विचारों के लिए जानी जाती हैं, ने छात्रों को यह समझाने का प्रयास किया कि कैसे महाभारत में शाकुन्तला एक सशक्त और स्वायत्त महिला के रूप में उभरती हैं, जबकि कलिदास के कथानक में वह एक पारंपरिक और पितृसत्तात्मक संरचनाओं के अनुरूप प्रस्तुत की गई हैं।

मिरांडा हाउस के सांस्कृतिक सभागार में छात्रों की भारी भीड़ ने इस व्याख्यान की महत्ता को दर्शाया। व्याख्यान के दौरान थापर ने स्पष्ट किया कि किस प्रकार पितृसत्तात्मक समाज ने स्त्रियों के स्वायत्त व्यक्तित्व को सीमित करने के लिए कथाओं को ऐसा रूप दिया। उन्होंने कहा, “शाकुन्तला का वही रूप, जो महाभारत में स्वतंत्र विचारों और निर्णय क्षमता वाली महिला के रूप में दिखता है, कलिदास के संस्करण में दुर्भाग्यवश विनम्रता और अधीनता में बदला गया है।”

उक्त विषय पर छात्रों ने गहन चर्चाएं भी कीं, विशेष रूप से इस बात पर कि कैसे इतिहास और साहित्य में महिलाओं की भूमिका को लेकर भेद और समय के अनुसार परिवर्तन होते रहे हैं। थापर ने इस बात पर ज़ोर दिया कि हमें पौराणिक कथाओं को सतही तरीके से नहीं बल्कि आलोचनात्मक दृष्टिकोण से समझना चाहिए ताकि समाज में व्याप्त असमानताएं और रूढ़िवादिता को पहचाना और दूर किया जा सके।

यह व्याख्यान न केवल विद्यार्थियों के लिए ज्ञानवर्धक था बल्कि सामाज और सांस्कृतिक सोच के बदलाव के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदेश था। रोमिला थापर जैसे विद्वानों द्वारा इस तरह के विश्लेषण हमें हमारे इतिहास, कला और साहित्य की जड़ों को समझने और वर्तमान सामाजिक संरचनाओं पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करते हैं।

इस आयोजन ने यह भी स्पष्ट किया कि इतिहासकारों और साहित्यकारों की जिम्मेदारी है कि वे अपने ज्ञान का प्रयोग समाज के उत्थान के लिए करें। इस प्रकार के संवाद हमारी संस्कृति को समझने और उसमें सुधार लाने का मार्ग प्रशस्त करते हैं। रोमिला थापर का यह व्याख्यान पितृसत्ता, सामाजिक न्याय और महिला अधिकारों के महत्व पर पुनः प्रकाश डालता है, जो आज के समय में भी अत्यंत प्रासंगिक हैं।

इस घटना से यह स्पष्ट होता है कि पारंपरिक कथाओं की पुनः व्याख्या और इतिहास की समीक्षा एक सतत प्रक्रिया है जो समाज के समग्र विकास में सहायक होगी।

Source

UP 24.in
Author: UP 24.in

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