महामारी के बाद गर्भवती माताओं में सिफलिस के मामले तेजी से बढ़े – जानिए इसके कारण

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Syphilis cases in expectant mothers have dramatically risen since the pandemic – here’s what’s driving the trend

नई दिल्ली, भारत

गर्भवती माताओं में सिफलिस के मामले महामारी के बाद तेजी से बढ़े हैं, जिसने स्वास्थ्य विभाग और विशेषज्ञों को चिंतित कर दिया है। सिफलिस, जो एक यौन संचारित रोग है, यदि गर्भावस्था के दौरान समय पर पहचाना और उसका उपचार न किया जाए, तो इससे गंभीर जटिलताएं हो सकती हैं, जिसमें गर्भपात, जन्मजात विकार और नवजात का मृत्यु तक हो सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, इस रोग की रोकथाम के लिए सबसे प्रभावी तरीका है गर्भावस्था के दौरान सभी महिलाओं की सार्वभौमिक जांच। यह जांच गर्भावस्था के तीन मुख्य चरणों में होनी चाहिए: पहला त्रैमासिक, तीसरा त्रैमासिक और डिलीवरी के समय।

डॉ. सीमा वर्मा, एक प्रसूति रोग विशेषज्ञ कहती हैं, “समान रूप से सभी गर्भवती महिलाओं का परीक्षण करना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि कई बार यह रोग किसी भी स्पष्ट लक्षण के बिना भी हो सकता है। महामारी के कारण स्वास्थ्य सेवाओं की सीमित पहुँच और सामाजिक दूरी के नियमों ने जांच को प्रभावित किया, जिससे कई मामले समय पर पकड़े नहीं जा सके।”

स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी इस संदर्भ में गर्भवती महिलाओं के लिए व्यापक स्क्रीनिंग प्रोग्राम शुरू किया है ताकि राष्ट्रीय स्तर पर इस बीमारी की रोकथाम सुनिश्चित की जा सके। मंत्रालय के एक अधिकारी के अनुसार, “स्क्रीनिंग के साथ-साथ तुरंत उपचार देने से जन्मजात सिफलिस के मामलों में भारी कमी लाई जा सकती है।”

संपूर्ण भारत में सरकारी अस्पतालों और क्लीनिकों में अब मुफ्त में सिफलिस जांच और उपचार सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। इसके साथ ही, जागरूकता बढ़ाने के लिए विभिन्न स्तरों पर प्रचार-प्रसार चलाया जा रहा है।

सामाजिक और स्वास्थ्य विशेषज्ञ भी समुदाय में इस बीमारी के प्रति जागरूकता बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं, ताकि गर्भवती महिलाएं जांच कराने और समय पर उपचार प्राप्त करने के लिए प्रेरित हों।

अंततः, महामारी के बाद बढ़े इस खतरे को कम करने के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता है जो कि गर्भवती महिलाओं की नियमित और समय पर जांच एवं उपचार से ही संभव है। इससे न केवल माताओं की बल्कि नवजात शिशुओं की स्वस्थ जीवन यात्रा सुनिश्चित की जा सकती है।

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UP 24.in
Author: UP 24.in

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