चेन्नई, तमिलनाडु। न्यायाधीश आर. साक्थिवेल ने हाल ही में एक याचिका पर टिप्पणी करते हुए कहा कि अधिवक्ता, जो खुद को एक सम्मानित व्यक्तित्व के रूप में प्रस्तुत करते हैं, उन्हें अपने मीडिया साक्षात्कारों के दौरान शब्दों के चयन में अत्यंत सतर्क रहना चाहिए था। यह बयान उस याचिकाकर्ता के खिलाफ दायर मामलों के संदर्भ में आया है जिसमें उस पर टीवीके की महिला समर्थकों के खिलाफ आपत्तिजनक और अपमानजनक टिप्पणियाँ करने का आरोप है।
न्यायालय ने कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र में बातचीत का स्तर और शब्दों की सीमा को समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि कोई व्यक्ति समाज में अपना सम्मान बनाए रखना चाहता है, तो उसे अपने वक्तव्य और अभिव्यक्ति के तरीकों में सावधानी बरतनी चाहिए।
मामले की सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता के पक्ष ने दावा किया कि टिप्पणियाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में आती हैं। हालांकि, न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर किसी अन्य समुदाय या समूह के प्रति अपमानजनक भाषा का प्रयोग स्वीकार्य नहीं है।
यह विवाद तब उठा जब याचिकाकर्ता द्वारा टीवीके की महिला समर्थकों के लिए की गई कथित गैरजिम्मेदार टिप्पणियाँ मीडिया में व्यापक चर्चा में आईं। इससे न केवल सत्ताधारी दल के सदस्यों में तनाव उत्पन्न हुआ, बल्कि सोशल मीडिया पर भी इसका व्यापक फैलाव देखने को मिला।
न्यायाधीश ने कहा, “सामाजिक सौहार्द्र बनाए रखने के लिए सभी को अपने शब्दों के प्रति जागरूक रहना चाहिए, विशेष रूप से ऐसे व्यक्तियों को जिनका सार्वजनिक प्रभाव अधिक है।” अदालत ने मामले की गहनता से जांच करने के निर्देश दिए और याचिकाकर्ता को भी उचित व्यवहार बनाए रखने की सलाह दी।
यह मामला पुनः यह संदेश देता है कि जिम्मेदार पत्रकारिता और सार्वजनिक बयानबाजी में संतुलन बनाए रखना कितना आवश्यक है। न्यायालय के इस रुख से यह भी स्पष्ट है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में सामाजिक संवेदनाओं का सम्मान अनिवार्य है।
इस प्रकार का फैसला भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और उसके सीमाओं के बीच एक महत्वपूर्ण समझौते को दर्शाता है, जो समाज के शांति और सामंजस्य को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है।
Author: UP 24.in
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