नई दिल्ली, भारत – विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि गर्भावस्था के दौरान उच्च रक्तचाप मातृ और शिशु दोनों के लिए गंभीर स्वास्थ्य जोखिम उत्पन्न कर सकता है। उन्होंने कहा है कि नियमित गर्भकालीन जांच, समय पर निदान और कड़ी निगरानी से इस खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
डॉक्टरों का कहना है कि प्रिक्लैम्सिया, दौरे, स्ट्रोक, समय से पहले प्रसव और भ्रूण विकास में रुकावट जैसी गंभीर जटिलताओं को रोकने के लिए महिला को नियमित रूप से स्वास्थ्य परीक्षण कराते रहना चाहिए। गर्भावस्था में रक्तचाप की सही देखभाल न होने पर ये जटिलताएं मातृ और शिशु दोनों के लिए जानलेवा साबित हो सकती हैं।
विशेषज्ञ समझाते हैं कि प्रेग्नेंसी के दौरान रक्तचाप का बढ़ना ‘गर्भावधि उच्च रक्तचाप’ या ‘प्रीक्लैम्सिया’ की ओर इशारा कर सकता है। प्रारंभिक लक्षणों में अत्यधिक थकान, सिरदर्द, दृष्टि में धुंधलापन, और पेट के निचले हिस्से में दर्द शामिल हो सकते हैं। इस स्थिति को नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है और स्वास्थ्य संबंधी गंभीर परिणाम ला सकता है।
डॉक्टरों ने कहा, “गर्भवती महिलाओं के लिए नियमित एंटीनेटल चेकअप बेहद जरूरी हैं ताकि रक्तचाप और किडनी फंक्शन का सही समय पर आकलन हो सके। इसके अलावा, यदि कोई असामान्य लक्षण दिखाई दें तो तुरंत विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए।”
स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, भारत में मातृ मृत्यु दर में कमी के बावजूद गर्भावस्था के दौरान उच्च रक्तचाप एक बड़ा चुनौतीपूर्ण कारण है। इससे निपटने के लिए सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों द्वारा जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं ताकि अधिक से अधिक महिलाओं को सुरक्षित प्रसव का मौका मिल सके।
अंत में, विशेषज्ञों ने समाज के सभी वर्गों से अपील की है कि वे गर्भवती महिलाओं को समय पर स्वास्थ्य जांच कराने, उचित पोषण देने और मानसिक समर्थन प्रदान करने में सहयोग दें। इससे न केवल मातृ बल्कि शिशु स्वास्थ्य में भी सुधार होगा और मातृ मृत्यु दर घटेगी।
Author: UP 24.in
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