नई दिल्ली, भारत – आजकल लगातार बढ़ रहे क्रॉनिक दर्द को न केवल शारीरिक समस्या के रूप में बल्कि मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर बाधा माना जा रहा है। खासकर ऐसे विकार जो आंत से संबंधित होते हैं, जैसे इरिटेबल बॉवेल सिंड्रोम (IBS), पेट में एसिडिटी और आंतों में सूजन, ये सभी लंबे समय तक बने रहने वाले शारीरिक कष्ट के उदाहरण हैं, जो धीरे-धीरे भावनात्मक सुन्नता की स्थिति को जन्म देते हैं।
डॉक्टरों और विशेषज्ञों के अनुसार, जब कोई व्यक्ति लगातार दर्द का सामना करता है, तो उसका मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र इस दर्द को सहनशीलता के स्तर तक लेकर जाता है, जिससे न केवल शारीरिक बल्कि मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी देखने को मिलते हैं। यह लगातार असुविधा व्यक्ति को मानसिक रूप से थका देती है और अंततः उसे भावनात्मक प्रतिक्रिया देने में असमर्थ बना देती है।
नई रिसर्च से पता चला है कि क्रॉनिक दर्द से जूझ रहे कई मरीजों में तनाव, चिंता और अवसाद जैसे मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं आम हो जाती हैं। इसके साथ ही, भावनात्मक सुन्नता की स्थिति में व्यक्ति अपने आस-पास की भावनाओं, चाहे वे सकारात्मक हों या नकारात्मक, महसूस करने में असमर्थ हो जाता है। यह स्थिति उसकी सामाजिक और व्यक्तिगत जिंदगी पर भी गहरा असर डालती है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि आंतों के स्वास्थ्य और मानसिक स्थिति के बीच गहरा संबंध होता है। गट-ब्रेन एक्सिस नामक इस कनेक्शन के चलते आंत में होने वाली सूजन और असंतुलन सीधे मानसिक स्वास्थ्य पर भी प्रभाव डालते हैं। जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक दर्द से ग्रस्त रहता है, तो ये आंत संबंधी विकार और भी गंभीर हो सकते हैं, जिससे स्थिति और बिगड़ जाती है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का सुझाव है कि क्रॉनिक दर्द और आंत के रोगों से पीड़ित लोगों के लिए केवल शारीरिक इलाज ही काफी नहीं होता, बल्कि उन्हें मानसिक स्वास्थ्य का भी बराबर ध्यान देना चाहिए। योग, ध्यान, मनोवैज्ञानिक सहायता, और संतुलित आहार जैसे उपायों से इस समस्या को काफी हद तक नियंत्रण में रखा जा सकता है।
अतः यह आवश्यक है कि हम क्रॉनिक दर्द को केवल एक शारीरिक समस्या के रूप में न देखें, बल्कि इसे मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य के लिए भी एक गंभीर खतरा समझें। सही निदान और उपचार के माध्यम से ही इन जटिलताओं से निजात पाया जा सकता है और जीवन की गुणवत्ता में सुधार किया जा सकता है।
Author: UP 24.in
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