शीमला, हिमाचल प्रदेश: पिछले कुछ वर्षों में डोकलाम संकट ने भारत और चीन के बीच रिश्तों में एक बड़ी भूमिका निभाई है। 2017 में हुआ यह विवाद सीमा विवादों के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण मोड़ था, जिसने दोनों देशों के सैन्य और राजनयिक प्रयासों को चुनौती दी। अब सवाल उठता है कि क्या डोकलाम फिर से भारत के लिए एक चुनौती बन सकता है? विशेषज्ञों, सैन्य अधिकारियों और राजनयिकों की राय इस विषय पर विभाजित हैं।
डोकलाम क्षेत्र भारत, चीन और भूटान के त्रिमुखी सीमा क्षेत्र में स्थित है। यह भू-भाग भूटान का एक हिस्सा है, लेकिन चीन ने इसे अपने क्षेत्र का दावा किया है। इस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति और सैन्य रणनीतिक महत्व इसे बेहद संवेदनशील बनाता है। 2017 के बाद से, भारत ने इस क्षेत्र में अपनी सतर्कता बढ़ाई है और भूटान के साथ सहयोग को मजबूत किया है।
विश्लेषकों का मानना है कि चीन की विस्तारवादी नीति और वहशतपूर्ण भू-राजनीतिक गतिवधियों के कारण डोकलाम पर नजर बनी हुई है। हालांकि दोनों देशों ने आपसी वार्ताओं और समझौतों के जरिए तनाव को कम करने की कोशिश की है, परन्तु सीमावर्ती क्षेत्रों में मामलों की अचानक बिगड़ने की संभावना बनी रहती है।
सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की कूटनीतिक रणनीतियों के साथ-साथ सेना की मजबूत उपस्थिति डोकलाम में किसी भी प्रकार के आक्रमण को रोकने में निर्णायक भूमिका निभाएगी। इसके अतिरिक्त, भूटान के साथ दोस्ताना संबंध और क्षेत्रीय सहयोग भी छोटे विवादों को बढ़ने से रोक सकता है। हालांकि, यदि चीन ने सैन्य या राजनीतिक दबाव बढ़ाने की कोशिश की, तो यह क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरा हो सकता है।
राजनयिक गलियारों में भी डोकलाम को लेकर सतर्कता बनी हुई है। भारत ने एशिया में सुरक्षा सहयोग को बढ़ावा दिया है और कई बहुपक्षीय मंचों पर अपनी स्थिति मजबूत की है। यह कदम चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के उद्देश्य से उठाए गए हैं। डोकलाम विवाद इसी रणनीति का एक अहम हिस्सा बना हुआ है।
अतः यह कहना premature होगा कि डोकलाम बहुत जल्दी भारत के लिए फिर से कोई बड़ा संकट बनेगा, लेकिन इसके लिए सावधानी से पेश आने और क्षेत्रीय जटिलताओं को समझने की आवश्यकता निश्चित रूप से बनी रहेगी। भविष्य में, कूटनीतिक समझ और सैन्य तैयारियों के मद्देनजर डोकलाम की भूमिका निर्णायक होगी।
Author: UP 24.in
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