नई दिल्ली, भारत – कोविड-19 महामारी के बाद लोग न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक स्वास्थ्य की चुनौतियों का भी सामना कर रहे हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चला है कि मनोवैज्ञानिक तनाव यानी मानसिक दबाव लॉन्ग कोविड यानी दीर्घकालिक कोविड के मरीजों में गंभीर जोखिम कारक साबित हो रहा है।
हाल ही में किए गए एक अध्ययन में यह स्पष्ट किया गया है कि कोविड से ठीक होने के बाद भी कई मरीजों को थकान, सांस लेने में कठिनाई, मस्तिष्क का धुंधलापन, और भावनात्मक अस्थिरता जैसे लक्षण महीनों तक बने रहते हैं। ये लक्षण विशेष रूप से उन व्यक्तियों में अधिक पाए गए जिनके उपचार के दौरान या उसके पूर्व उच्च मनोवैज्ञानिक तनाव मौजूद था।
विशेषज्ञों का कहना है कि महामारी के दौरान फैला डर, अनिश्चितता, सामाजिक अलगाव, आर्थिक संकट, और व्यक्तिगत नुकसान ने मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डाला है। जब व्यक्ति कोविड से संक्रमित होता है, तो इन मानसिक कारकों का प्रभाव उसकी प्रतिरक्षा प्रणाली और शरीर की रिकवरी प्रक्रिया पर पड़ता है, जिससे दीर्घकालिक जटिलताएं बढ़ सकती हैं।
डॉ. सीमा चौहान, मनोचिकित्सक और महामारी विशेषज्ञ, बताती हैं, “मनोवैज्ञानिक तनाव के कारण शरीर में तनाव हार्मोन का स्तर बढ़ता है, जो विषाणु से लड़ने की क्षमता को कम करता है। इस वजह से मरीज कोविड के बाद भी लंबे समय तक स्वास्थ्य समस्याओं से जूझते रहते हैं।”
सरकारी और स्वास्थ्य एजेंसियों को चाहिए कि वे कोविड निवारण रणनीतियों में मानसिक स्वास्थ्य को भी प्राथमिकता दें। कोरोना के प्रभावों को समझने के लिए व्यापक शोध हो रहे हैं, जो लॉन्ग कोविड के उपचार में नए रास्ते खोल सकते हैं।
अंततः यह स्पष्ट हो चुका है कि कोविड से केवल फिजिकल बीमारी ही नहीं बल्कि मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल भी समान रूप से जरूरी है, जिससे हम एक स्वस्थ और मजबूत समाज का निर्माण कर सकें।
Author: UP 24.in
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