वाइल्डलाइफ निगरानी के लिए ड्रोन तैनाती पर विशेषज्ञों ने उठाए पर्यावरण और निजता संबंधी चिंताएं

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Experts flag ecological, privacy concerns over drone deployment for wildlife monitoring

त्रिवेंद्रम, केरल – केरल वन विभाग की ओर से यह दावा किया गया है कि जंगलों में ड्रोन का उपयोग केवल वन्यजीवों की निगरानी के लिए किया जा रहा है, लेकिन विशेषज्ञों ने इसके संभावित असर को लेकर सतर्कता बरतने की आवश्यकता जताई है। उन्होंने कहा है कि ड्रोन तैनाती से न केवल वन्यजीवों के व्यवहार पर असर पड़ सकता है, बल्कि आम लोगों की निजता भी खतरे में आ सकती है।

केरल वन विभाग ने हाल ही में ड्रोन तकनीक अपनाकर जंगलों में तेजी से निगरानी करने की प्रक्रिया शुरू की है। विभाग का मानना है कि ड्रोन से वन्यजीवों की गतिविधियों और क्षेत्र की स्थिति की जानकारियां समय रहते उपलब्ध हो जाती हैं, जिससे वन संरक्षण में मदद मिलती है। हालांकि, विशेषज्ञ इस बात पर चिंता जता रहे हैं कि ड्रोन के लगातार उपयोग से जंगली जानवरों में तनाव और व्यवहार में बदलाव आ सकता है, जो पर्यावरणीय संतुलन के लिए हानिकारक हो सकता है।

वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ. अंजना मेनन का कहना है, “ड्रोन की आवाज और उपस्थिति से पशु सहज महसूस नहीं करते, जिससे उनकी प्राकृतिक जीवनशैली प्रभावित होती है। इससे उनके प्रजनन और भोजन की आदतों पर भी नकारात्मक असर पड़ता है।” वहीं, पर्यावरणविद् सूरज नायर ने कहा, “ड्रोन तकनीक वन संरक्षण में मददगार हो सकती है, लेकिन इसके लिए कड़े नियम और मानक निर्धारित होने चाहिए ताकि जानवरों और मानव दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।”

साथ ही, निजता संरक्षण के लिए भी विशेषज्ञों ने सख्त कदम उठाने की सलाह दी है। ग्रामीण क्षेत्रों में ड्रोन उड़ाने से स्थानीय लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर असर पड़ सकता है। नागरिक अधिकारों के जानकार कहते हैं कि बिना अनुमति या उचित प्रावधान के ड्रोन का उपयोग करना लोगों के निजी जीवन में दखलअंदाजी माना जा सकता है।

केरल सरकार को आपसी सहयोग से ऐसे नियम बनाने होंगे जो पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ नागरिकों की निजता का भी पूरा ध्यान रखें। वन विभाग को चाहिए कि वे ड्रोन तैनाती में पारदर्शिता रखें और किसी भी संभावित दुरुपयोग को रोकने के लिए प्रभावी निगरानी प्रणाली लागू करें।

इस बीच, वन्यजीव और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन साधना हर किसी का साझा ज़िम्मेदारी बनती जा रही है। ड्रोन तकनीक से वन संसाधनों की सुरक्षा तो हो सकती है, लेकिन उसके दुष्प्रभावों को नजरअंदाज करना भी उचित नहीं होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीकी प्रगति के साथ सुरक्षा मानकों का विकास और उनकी कड़ाई से पालना ही भविष्य में पर्यावरण और समाज का बेहतर संरक्षण सुनिश्चित कर सकती है।

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UP 24.in
Author: UP 24.in

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