नई दिल्ली, भारत – अमेरिका ने 2018 में अपने प्रशांत सैन्य कमांड USPACOM को USINDOPACOM में बदलकर एक महत्वपूर्ण संकेत दिया था, जो US-India संबंधों के नए युग की शुरुआत का प्रतीक बना। इस कदम ने भारतीयोशियन क्षेत्र और भारत की सुरक्षा भूमिका पर बहस छेड़ दी। अमेरिका ने प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए अपनी रणनीतियों को और व्यापक बनाया था।
चीन की आक्रामकता, भारत-चीन सीमा पर लगातार तनाव, और बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के चलते भारत की सुरक्षा चुनौतियां बढ़ गई हैं। श्रीलंका, म्यांमार, बांग्लादेश और मालदीव जैसे देश, जो पहले भारत के करीबी सहयोगी माने जाते थे, अब चीन के प्रभाव क्षेत्र में आ रहे हैं। इस वजह से भारत को अपनी रणनीति को पुनः तैयार करने की जरूरत है।
अमेरिका और जापान दोनों ही दक्षिण चीन सागर में चीन के विस्तार को रोकने पर विशेष ध्यान दे रहे हैं। मलेक्का जलडमरूमध्य से होकर विश्व ऊर्जा के 80% से अधिक हिस्सा गुजरता है, जिससे यह समुद्री मार्ग सशत्र महत्वपूर्ण बन जाता है। इन सब कारणों से दिल्ली के लिए आवश्यक हो गया है कि वह इंडो-अटलांटिक क्षेत्र में अपने संबंध मजबूत करे, ताकि क्षेत्र में सामरिक और आर्थिक स्थिरता बनी रहे।
भारत और अमेरिका के बीच कूटनीतिक, सैन्य और आर्थिक सहयोग मैंनेजमेंट को आगे बढ़ाना ही दोनों देशों के लिए पारस्परिक लाभकारी सिद्ध होगा। साथ ही, भारत को अफ्रीका और यूरोप के साथ भी अपने समुद्री और रणनीतिक सम्बन्धों को सुदृढ़ बनाने की दिशा में आगे बढ़ना होगा। इससे भारत के ग्लोबल इन्फ्लुएंस और सुरक्षा कवरेज को बढ़ावा मिलेगा।
नए भू-राजनीतिक परिदृश्य में, जब अमेरिका प्रशांत क्षेत्र से अपना फोकस हटा रहा है, दिल्ली के लिए यह अवसर है कि वह इंडो-अटलांटिक क्षेत्र के महत्त्व को समझे और वहां अपनी उपस्थिति मजबूत करे। यह न केवल क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए आवश्यक होगा, बल्कि भारत के वैश्विक नेतृत्व के लिए भी अहम साबित होगा।
समाचार विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अपनी उत्पादित शक्तियों और कूटनीतिक संसाधनों का उपयोग कर सतत और संपन्न क्षेत्रीय भागीदारी को बढ़ावा देना चाहिए। ऐसे समय में जब विश्व का सत्ता संतुलन बदल रहा है, भारत के लिए अवसर और चुनौती दोनों ही समाहित हैं।
Author: UP 24.in
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