नई दिल्ली, भारत
भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य खर्च में वृद्धि के बावजूद, घरेलू परिवारों पर स्वास्थ्य सेवा का भार लगातार बना हुआ है। सरकारी प्रयासों के तहत कई स्वास्थ्य योजनाएं और कार्यक्रम लागू किए जा रहे हैं, लेकिन ज्यादातर स्वास्थ्य लागत अभी भी सीधे घरों की जेब से ही निकलती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति लोगों के लिए आर्थिक रूप से बड़ी चुनौती बनी हुई है, खासकर निम्न और मध्यम आय वर्ग के लिए।
स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में सरकारी स्वास्थ्य व्यय में निरंतर बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जो देश की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का एक अपेक्षाकृत बड़ा हिस्सा बनता जा रहा है। इसके बावजूद, निजी स्वास्थ्य सेवाओं पर निर्भरता बनी हुई है, जिससे परिवारों को कई बार रोग के खर्च वहन करने में कठिनाई होती है। इस जोखिम को कम करने के लिए सरकार ने स्वास्थ्य बीमा योजनाओं को बढ़ावा दिया है, लेकिन व्यापक हिस्से तक इसकी पहुंच अभी भी सीमित है।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि निवारक स्वास्थ्य देखभाल पर पर्याप्त निवेश न होने के कारण लोग बीमारियों के चलते अक्सर महंगे इलाजों पर निर्भर हो जाते हैं। सामान्य स्वस्थ आदतों को बढ़ावा देने, टीकाकरण, पोषण, और स्वच्छता जैसे क्षेत्रों में निवेश को बढ़ाना आवश्यक है ताकि बीमारी की संभावना को रोका जा सके। इन प्रयासों में कमी के कारण, देश में स्वास्थ्य संबंधी खर्चों का एक बड़ा हिस्सा इलाज और अस्पतालों पर गिरता है।
हालांकि सरकार ने आयुष्मान भारत जैसी योजना शुरू की है, जो गरीब और जरूरतमंद परिवारों को कुछ हद तक वित्तीय सुरक्षा प्रदान करती है, लेकिन इससे अभी भी घरेलू आधारित स्वास्थ्य खर्च पूरी तरह कम नहीं हुआ है। सरकारी अस्पतालों में अवसंरचना और सेवाओं की कमी भी निजी संस्थानों की ओर झुकाव बढ़ाती है, जिससे लागत बढ़ जाती है।
अंतत: विशेषज्ञ और नीति निर्धारक इस ओर ध्यान देने की सलाह देते हैं कि स्वास्थ्य क्षेत्र में केवल खर्च बढ़ाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसे सही दिशा में और समान रूप से वितरित करना भी जरूरी है। इससे सुनिश्चित होगा कि सभी वर्गों के लोग उचित स्वास्थ्य सेवाएं प्राप्त कर सकें बिना अपनी जेब ढीली किए।
Author: UP 24.in
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