नई दिल्ली, भारत – एड्स का कारण बनने वाले वायरस HIV को एक तेज़ मार देने वाला रोग से नियंत्रित दीर्घकालिक बीमारी में बदलने के लिए आज की दवाएँ काफी हद तक कारगर साबित हुई हैं। हालांकि यह उपलब्धि तब तक सीमित है जब तक कि रोगी दवाओं को नियमित रूप से ले सकें और उनकी खरीद क्षमता भी हो।
पुराने दिन थे, जब HIV संक्रमण एक निश्चित मृत्यु का संदेश लेकर आता था, पर आज के चिकित्सा विज्ञान ने इस वायरस को नियंत्रण में रखने के लिए अनेक दवाइयां विकसित की हैं, जिनसे वह वायरस शरीर में लगभग पता नहीं चलता। इन्हें एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी (ART) कहा जाता है, जो वायरस को बढ़ने और शरीर में फैलने से रोकती हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि इन दवाओं के कारण HIV संक्रमित व्यक्ति सामान्य जीवन जी सकते हैं, लेकिन यह तभी संभव हो पाता है जब रोगी दवाओं का नियमित सेवन करें और आर्थिक रूप से सक्षम हों। कई देशों में दवाओं की कीमतें इतनी अधिक हैं कि गरीब और वंचित तबक़े इस सुविधा से वंचित रह जाते हैं।
इस विषय पर एक छोटी सी हालिया अध्ययन में उल्लेख किया गया कि इम्यून कोशिकाओं की सक्रियता बढ़ाकर वायरस से लड़ाई को और भी प्रभावशाली बनाया जा सकता है। यह नई खोज HIV के इलाज में संभावित नई दिशा खोल सकती है। विशेषज्ञ इस बात पर ज़ोर देते हैं कि दवाओं के साथ ही रोगी की जीवनशैली और नियमित स्वास्थ्य परीक्षण भी जरूरी हैं।
स्वास्थ्य मंत्रालय और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले लोगों के लिए दवाओं की लागत कम करने और उनकी उपलब्धता बढ़ाने की दिशा में निरंतर प्रयासरत हैं। इसके साथ ही जागरूकता अभियानों के जरिये लोगों को ART की महत्ता और नियमित सेवन की आवश्यकता से अवगत कराया जा रहा है।
क्या चिकित्सा जगत HIV को पूरी तरह खत्म कर पाएगा या केवल नियंत्रित रख पायेगा, यह अभी एक खुला सवाल है। फिलहाल, विशेषज्ञों का मानना है कि सही दवा, सही समय पर लेना और सामाजिक, आर्थिक समर्थन HIV संक्रमण को एक प्रबंधनीय अवस्था में रखने की कुंजी है।
ऐसे में यह आवश्यक भी हो जाता है कि चिकित्सा शोध लेखकों, सरकारों और समुदाय के बीच सहयोग और निवेश में वृद्धि हो ताकि एचआईवी से प्रभावित लोगों की संख्या को कम किया जा सके और उन्हें बेहतर जीवन प्रदान किया जा सके।
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Author: UP 24.in
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