भोपाल / मुंबई।
देश के चर्चित शाहबानो केस पर आधारित फिल्म ‘हक़’ (Haq) को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। शाहबानो बेगम की बेटी सिद्दिका बेगम ने फिल्म के निर्माताओं और कलाकारों यामी गौतम धर व इमरान हाशमी को कानूनी नोटिस भेजा है और मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में याचिका दायर कर फिल्म की रिलीज़ पर रोक लगाने की मांग की है।
फिल्म ‘हक़’ की कहानी कथित तौर पर शाहबानो केस से प्रेरित बताई जा रही है, जिसमें यामी गौतम एक मुस्लिम महिला के किरदार में नज़र आ रही हैं, जबकि इमरान हाशमी उनके पति की भूमिका निभा रहे हैं। यह फिल्म 7 नवंबर 2025 को रिलीज़ होने वाली है।
सिद्दिका बेगम का आरोप है कि फिल्म में उनकी मां शाहबानो की असली जिंदगी के हिस्सों को बिना अनुमति के दिखाया गया है, जिससे परिवार की निजता का उल्लंघन हुआ है। उन्होंने अदालत से मांग की है कि फिल्म की स्क्रीनिंग पर रोक लगाई जाए जब तक कि पूरी तरह तथ्यों की जांच न हो जाए।
इसी बीच, शाहबानो के नाती जुबैर अहमद ख़ान ने भी फिल्म पर आपत्ति जताई है। उन्होंने समाचार एजेंसी एएनआई से कहा —
“जो भी ये पिक्चर बना रहे हैं उन्होंने हमसे न तो संपर्क किया, न कोई इजाज़त ली। न हमको कहानी या कुछ भी बताया कि हम आपकी नानी के ऊपर ये फ़िल्म बना रहे हैं। कोई भी चीज़ होती है तो एक परिवार होने के नाते वह हमें प्रभावित करती है।”
वहीं, फिल्म के निर्माताओं की ओर से कहा गया है कि ‘हक़’ एक काल्पनिक (फिक्शनल) कहानी है, जो किसी व्यक्ति विशेष पर आधारित नहीं है। उनका कहना है कि फिल्म का उद्देश्य सिर्फ महिला अधिकारों और सामाजिक न्याय के मुद्दों को सामने लाना है।
ज्ञात हो कि 1985 में शाहबानो बेगम का मामला देशभर में चर्चा का विषय बना था, जब सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें भरण-पोषण (Maintenance) का अधिकार दिया था। इस फैसले के बाद देश में मुस्लिम महिला अधिकारों को लेकर बड़ी बहस छिड़ी थी। 🟣 शाहबानो केस की पृष्ठभूमि: जब एक महिला की लड़ाई ने देश का कानून बदल दिया
इंदौर की रहने वाली शाहबानो बेगम का निकाह साल 1932 में हुआ था। उनके पांच बच्चे थे।
साल 1978 में, जब शाहबानो 62 वर्ष की उम्र में थीं, तो उन्होंने अपने पति मोहम्मद अहमद ख़ान से तलाक़ के बाद हर महीने 500 रुपये गुज़ारा भत्ता (maintenance) की मांग करते हुए अदालत का दरवाज़ा खटखटाया।
उन्होंने यह याचिका दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत दाखिल की थी — यह धारा सभी धर्मों की महिलाओं को भरण-पोषण का अधिकार देती है।
वहीं, उनके पति ने अदालत में यह तर्क दिया कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार, तलाक़ के बाद पति सिर्फ इद्दत की अवधि तक ही गुज़ारा भत्ता देने के लिए बाध्य होता है।
इद्दत वह अवधि होती है, जो एक मुस्लिम महिला अपने पति की मृत्यु या तलाक़ के बाद बिताती है। यह सामान्यतः तीन महीने की होती है, लेकिन परिस्थितियों के अनुसार इसमें बदलाव किया जा सकता है।
मामले की सुनवाई कई वर्षों तक चली और आखिरकार 1985 में सुप्रीम कोर्ट ने शाहबानो के पक्ष में ऐतिहासिक फैसला सुनाया।
अदालत ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 125 सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होती है, चाहे वे किसी भी धर्म से क्यों न हों।
यह निर्णय भारतीय न्याय इतिहास में मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की दिशा में मील का पत्थर साबित हुआ।
हालांकि, मुस्लिम समुदाय के एक बड़े वर्ग ने इस फैसले का विरोध किया और इसे शरीयत कानून में हस्तक्षेप बताया।
विरोध के बढ़ते दबाव में, राजीव गांधी सरकार ने एक वर्ष बाद “मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 1986” पारित किया।
इस कानून के बाद सुप्रीम कोर्ट का शाहबानो केस वाला फैसला व्यावहारिक रूप से पलट गया, और यह तय किया गया कि मुस्लिम महिला को सिर्फ इद्दत की अवधि तक ही भरण-पोषण का अधिकार मिलेगा।
प्रकाशन तिथि: 4 नवंबर 2025
✍️ लेखक: मज़ाहिर हसन
Author: UP 24.in
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